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गंगा माँ, तेरी महिमा निराली

गंगा माँ, तेरी महिमा निराली

स्वर्ग लोक से है तू आई,
शंकर जी की जटा समाई
भागीरथ की लाज बचाई
पत्थर में आत्मा डाली।
गंगा माँ, तेरी महिमा निराली।।

प्रण शान्तनु ,ने जब तोड़ा,
राजमहल का सुख था छोड़ा,
शाप का घोड़ा ऐसा दौड़ा,
एक वसू की जान बचा ली।
गंगा माँ, तेरी महिमा निराली।।

कल-कल करती तू है बहती,
हर पाप मैं धोऊँ, तू ह कहती,
दामन पे दाग, तु खुद है सहती,
जाने कैसी, धुन है लगा ली।
गंगा माँ, तेरी महिमा निराली।।

विकराल रूप, तू जब जब धरती,
विनाश का तांडव, है तू करती,
जान हाथ से, लगे फिसलती,
कोई छूट, ना जाये मवाली।
गंगा माँ, तेरी महिमा निराली।।

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