गंगा का अपमान

जो बहती थी पवित्रता लिए,
अपने ही धुन में कल कल छल छल,
जिसके पानी अमृत समान थे,
जहां पवित्र होती थी आत्मा नहाकर,
आज जहर लिए फिरती है,
आगोश में अपने,
कारखाने के कचरे, शहर का पानी!
समेटे हुए जलधारा में अपने,
रोते बिलखते हैं गंगा से पोषित,
जलचर भी पूछे हुआ कैसे दूषित,
संवेदनहीन हुआ देखो ganga के बेटे,
गंगा का अपमान सहूं बोलो कैसे!!!

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