Skip to content

ख्वाहिशों में खुद को उलझा के निकलती हूँ

suresh sangwan

suresh sangwan

कविता

December 11, 2016

ख्वाहिशों में खुद को उलझा के निकलती हूँ
ज़िंदगी तिरे दर से में मुरझा के निकलती हूँ

होते होते शाम के ये उलझ ही जाती है
रोज़ सवेरे ज़ुल्फ को सुलझा के निकलती हूँ

आज की रात को भी चाहिए रोशनी इसलिए
घर के सारे दीये में बुझा के निकलती हूँ

रक़ीब कोई नहीं सबसे हँस के मिलना है
रोज़ अपने अहम को समझा के निकलती हूँ

फ़िज़ूल की हरकतों से दूर ही रहें इसलिये
बच्चों को उनके काम में उलझा के निकलती हूँ

कोइ और तरीक़ा ढूंढ़ेंगे आज जीने का
रोज़ नया ख़्याल खुद को सुझा के निकलती हूँ

तुमको भी संवारेगी ‘सरु’ जी जान से अपने
घर की दर-ओ-दीवार को समझा के निकलती हूँ

Share this:
Author
suresh sangwan
Recommended for you