कविता · Reading time: 1 minute

ख्वाब

पढ़ रही थी एक किताब ,
खोई थी मैं उसी जहाँ में !
कोई समझ न पाया,
क्या बुन रही थी मैं ख्वाब में!
सामने थे टूटे ख्वाबों के ढेर ,
चुन रही मैं एक -एक कर!
उठा लिया कुछ टूटे ख्वाबों को,
फिर उससे जोड़ा दिल वाले दिमाग को!
टूटे ख्वाबों को जोड़ते हुए सोचा,
नये ख्वाबों को बुनते हुए सोचा!
ख्वाबों में जो सजता है हर दिन,
सच होता है वो यकीनन एक दिन!!

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