Dec 1, 2019 · कविता

खोज

खोज
——-
मैं भारत मां , मुर्दों के शहर में कोई जिंदा इंसान ढूंढती हूं ,
मैं इक नारी, नामर्दों के इस शहर में मर्द ढूंढती हूं !
संविधान की किताब में अपनी सुरक्षा का कानून ढूंढती हूं,
मैं भारत मां , मुर्दों के शहर में कोई जिंदा इंसान ढूंढती हूं !
पैदा होते ही पहचान ले जो अपनी कोख के कलंक को
और अपने हाथों ममता का गला घोंट दे ऐसी मां ढूंढती हूं !
मैं भारत मां, मुर्दों के शहर में कोई जिंदा इंसान ढूंढती हूं !
अंतिम संस्कार का हक लेकर पैदा हुई जो नन्ही जान
उसको देने आखिरी चुंबन राख में उसका चेहरा ढूंढती हूं !
मैं भारत मां , मुर्दों के शहर में कोई जिंदा इंसान ढूंढती हूं !
न जाने कौन दिशा से झुंड आ निकले वहशी भेड़ियों का
इस जंगलराज में देखा बस रामराज्य का सपना ढूंढती हूं !
मैं भारत मां , मुर्दों के शहर में कोई जिंदा इंसान ढूंढती हूं !
हर आस, उम्मीद न्याय की अब तो दम तोड़ चुकी
अपनी हर बेटी की सांसों में डर से पैदा मौत ढूंढती हूं !
मैं भारत मां , मुर्दों के शहर में कोई जिंदा इंसान ढूंढती हूं !
Sugyata

2 Comments · 14 Views
You may also like: