खेल वक्त का

वक्त नहीं उन्हें
परवाह
करने की हमारी
हमने उनकी
यादों में
काट दी जिन्दगी

चिता भी
है बड़ी बेशरम
जलाती रहती है
शरीर
और कहती है
चिंता से
जला इन्सान का
तन

करते रहे
माता पिता
परवाह
बच्चों की
जिन्दगी भर
बुढ़ापे में
छोड़ दी
चिन्ता
बच्चों ने

करों परवाह
शरीर की
रखोगे
चुस्त दुरुस्त
तो नहीं
करनी पड़ेगी
चिन्ता
बीमारी की

करता है
मौला परवाह
बन्दों की
फिर क्यों
फिक्र करे
फकीर

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 1

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share