कविता · Reading time: 1 minute

खेल किस्मत के

है खेल
निराले
भाग्य के
कहीं खुशी तो
कहीं गम
है नियति
जन्म है
तो निश्चित है
मृत्यु

है
विधि का
विधान ये
है उत्पत्ति तो
है अंत भी

है
बेटी का
जन्म
नियति
पालो पोसो
हो जाए
विदाई
घर से

है नियति
माँ बाप की
सींचो अंगना में
बच्चे
पढाओ
लिखाओ
लगी नौकरी
हुई शादी
लग गये पंख
अकेले
रह गये
बूढ़े दो

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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