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खेलती है चिन्गारियां

Sonika Mishra

Sonika Mishra

कविता

December 10, 2016

खेलती है चिन्गारियां
बेबस आग के लिए
है मजदूर लहू बहाता
कठपुतली से बैठे
साहूकार के लिए
दीर्घ चोटी पर
है लहराता ध्वजा
मिट जाती है नींव
स्वाभिमान के लिए
कितनी सांसे जी ली
न जाने कितनी बाकी है
कौन आता है यहाँ
हिसाब के लिए
मेरा मकसद नहीं
शीर्ष पर पहुंचना
मैं आयी हूं इस जहां में
धूल से लिपटे हाथों के
कीर्तिमान के लिए

-सोनिका मिश्रा

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Author
Sonika Mishra
मेरे शब्द एक प्रहार हैं, न कोई जीत न कोई हार हैं | डूब गए तो सागर है, तैर लिया तो इतिहास हैं ||

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