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खून

डॉ संगीता गांधी

डॉ संगीता गांधी

लघु कथा

August 18, 2017

खून —
——-

रफ़ीक़ का दरिंदों जैसा रूप देख मुराद सहम गया ।
हलक से आवाज़ खींच कर बोला –” रफ़ीक़ ,हम कल तक इन्हीं के साथ मोहब्बत से रहते थे ।”
” मुल्क बंट गया तो क्या जज़्बात भी बंट गए ?”
” इन्हें सुकून से हिंदुस्तान जाने दे ।”
” चुप कर ,बड़ा आया अमन का पहरेदार ।”
” इन काफिरों की लाशें ही हिंदुस्तान जाएंगी ।”
रफ़ीक़ का जुनून देख मुराद चुप हो गया ।
” तुझे पता है मुराद ,आज मैंने पांच काफिरों और एक 12 साल की काफ़िर लड़की को कत्ल किया ।”
” एक काफिर के घर में चुन्नी से मुंह ढके बैठी थी ।”
मुराद ने हिकारत से रफ़ीक़ को देखा और अपने रास्ते निकल गया।
तभी एक 15 साल का लड़का रफ़ीक़ के पास आया -” अब्बा ,अम्मी बहुत परेशान है ।सायरा कहीं मिल नहीं रही ।”
” सुबह ये कह कर निकली थी कि अपनी सहेली सुमन के घर जा रही है ।”
” सुमन कौन ?”
रफ़ीक़ ने प्रश्न वाचक मुद्रा में पूछा ।
” अब्बा ,वो पिछली गली वाले लाला की बेटी ।जो दो महीने पहले ही स्यालकोट से लाहौर आये हैं रहने ।”
” सायरा अक्सर उनके यहां जाती है ।”
” उनके घर गया तो घर बन्द है ।”
रफ़ीक़ बेटे के साथ दौड़ कर पिछली गली पहुंचा ।
ये वही घर था जिसके बाशिंदों के खून से रफ़ीक़ की तलवार की प्यास बुझी थी ।
कत्ल के बाद रफ़ीक़ बाहर से ताला डाल आया था ।
उसने जल्दी से ताला खोला ।
उसी के द्वारा काटी गयीं लाशों में रफ़ीक़ बेटी ढूंढने लगा ।
चुन्नी वाली लड़की की उल्टी पड़ी लाश सीधी की ….
” अब्बा ,सायरा को किसने मारा ?”
रफ़ीक़ सुन्न खड़ा था ।
तभी बुर्के में कांपती हुई एक लड़की किवाड़ की ओट से दिखी । चेहरा स्याह जर्द था ।
” अब्बा ,ये सुमन है ।”
” ये तो सायरा का बुर्का है !”
रफ़ीक़ लड़की के पास गया ।
लड़की आंधी में सूखे पते सी थरथरा रही थी ।
” लड़की ! सायरा का बुर्का तुझ पर कैसे ?”
सुमन की डर से नीली पड़ी जीभ सुन्न थी ।
” बोल !” रफ़ीक़ चिल्लाया
” जब आप मेरे घरवालों को मार रहे थे तो सायरा ने अपना बुर्का मुझे पहना दिया और खुद मेरी चुन्नी से मुंह ढक कर बाहर चली गयी ।”
” मैं अंदर छुप गयी ।”
सुमन एक ही सांस में बोल गयी ।
रफ़ीक़ अपनी तलवार पर लगे खून को देख रहा था ।पता नहीं चल रहा था कि –उसमें सायरा का खून और काफिरों का खून कौन कौन सा है !

डॉ संगीता गांधी

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