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खूंटी पर टंगी कमीज़ को ….

sushil sarna

sushil sarna

कविता

June 7, 2017

खूंटी पर टंगी कमीज़ को ….

जब जब
मैं छूती हूँ
खूंटी पर
टंगी कमीज़ को
मेरा समूचा अस्तित्व
रेंगने लगता है
उस स्पर्शबंध के आवरण में
जहां मेरा शैशव
निश्चिंत सोया करता था
अब
जब आप नहीं रहे
मैं इस कमीज़ में
आपको महसूस करती हूँ
सामना करती हूँ
हर उस दूषित दृष्टि का
जो मेरे शरीर पर
अपनी कुत्सित भावनाओं की
खरोंचें डालती है
मेरी दृष्टिहीनता को
मेरी कमजोरी मानती है

न, न
आप क्यूँ डरते हैं
आप ने ही तो मुझे
मन की आँखों से देखना
सिखाया है
आप नहीं हैं
पर है
इस खूंटी पर
टंगी कमीज में
आपके होने का विश्वास
पापा

सुशील सरना

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Author
sushil sarna
I,sushil sarna, resident of Jaipur , I am very simple,emotional,transparent and of-course poetry loving person. Passion of poetry., Hamsafar, Paavni,Akshron ke ot se, Shubhastu are my/joint poetry books.Poetry is my passionrn
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