गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

खुशी पल भर नही देखे

जिगर पर चोट खा कर भी तेरे कूचे में आए है
दवा दे या ज़हर दे दे तेरे सपने सजाए है

खुशी का क्या ठिकाना हो अभी वो पास हैं मेरे
जमाने बाद देखो आज यूँ पहलू में आए है

सताया उम्र भर जिसने सताने अब नही आता
उठा लूँ नाज़ सब तेरे कहाँ खुद को छुपाए है

झगड़ती अब नही मुझसे भला क्या हो गया तुमको
तेरा खामोश रहना ही मुझे पलपल जलाए है

उलझ कर रह गया मैं तो किसी की मीठी बातों में
घड़ी जब आखरी आई मुझे ये दिल समझाए है

बहारें हैं अभी बाकी मगर सूना जहाँ मेरा
खुशी पल भर नही देखे डरे मंजर दिखाए है

किया है दफ़्न खुद को ही नही उंगली उठे तुम पर
तुम्हे बस देख लूँ जी भर कज़ा भी साथ लाए है

– ‘अश्क़’

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