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खुशियों के अब जाने कहाँ घराने हो गये

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

December 11, 2016

खुशियों के अब जाने कहाँ घराने हो गये
इस दिल को मुस्कुराए हाय ज़माने हो गये

नज़र रह गई तकती मौसम-ए-बरसात को
बादलों के जाने अब कहाँ ठिकाने हो गये

उम्र के ख़ाते में हाय दिन हज़ारों जुड़ गये
ज़िंदगी के मायने बस दिन बिताने हो गये

जुनूं की मर्ज़ी मंज़िल पर ले जाये किसको
राह-ए-उलफत पर कितने दीवाने हो गये

हम आज तक ना समझे क्या हैं चालाकियाँ
बच्चे भि इस दौर के बहुत सयाने हो गये

हो गया हम-दर्द कोई जब दर्द में शामिल
दर्द- भरे गीत भी मीठे तराने हो गये

दिल-ए-सरु की हलचल का अंदाज़ नहीं उसको
लब खुले भी नहीं और अफ़साने हो गये

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Author
suresh sangwan
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