कविता · Reading time: 1 minute

खुशबू

हर तरफ तेरी ही खुशबू और तेरा ही बस नज़ारा है,
“हसीन दिलबर” तू फूलों का महकता हुआ साया हैI

इंसान जब इंसानियत से दूर होता हुआ चला जाए,
“नफरत का तिलक” अपने माथे पर गर्व से लगाये ,
तेरे कहर में दुनिया का इंसान-इंसान सहम जाए,
तब तेरी नज़र जिन्दगी जीने का रास्ता दिखाए,

हर तरफ तेरी ही खुशबू और तेरा ही बस नज़ारा है,
रूठ न जाना मेरे यार तू ही मेरे जीने का सहारा है I

पल भर की जिंदगी के लिए बरसों का वो इंतजाम कर रहे,
खुद का ठिकाना नहीं “जहाँ” में पीढ़ियों का हिसाब कर रहे ,
“ फूलों के खूबसूरत शहर ” में वो कांटो का कारोबार कर रहे,
गुनाहों को माथे पर सजाकर तेरे खौफ से भी अब नहीं डर रहे ,

हर तरफ तेरी ही खुशबू और तेरा ही बस नज़ारा है,
कर ले कितने सितम ? तू हे मेरे जीने का सहारा हैI

फूलों की नगरी को उजाड़ने का दौर चल रहा,
फूलों को आपस में बाँटने का यह दौर चल रहा,
इंसानियत को मिटाने का कैसा दौर चल रहा?
मिलना है समंदर से पर दरिया कुलाचें भर रहा ,

हर तरफ तेरी ही खुशबू और तेरा ही बस नज़ारा है,
मेरे साजन एक बार कह दे “राज” से तू हमारा है I

देशराज “राज”

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