कविता · Reading time: 1 minute

खुशबू का झोंका

थका सा कुछ निराश सा
सो गया नींद के इंतजार में
सुबह के इंतजार में
बिगर नहाये चले गये
पानी के इंतजार में
दुकान पर जा बैठे,ग्राहक के इंतजार में
कुछ ले बैठे,कुछ दे बैठे
कुछ लेने के इंतजार में
कुछ देने के इंतजार में
यू ही पिसते रहे दुनियादारी के
झमेलों से,
खुशियो के इंतजार में
जिंदगी यू ही गुजर गयी
ओर अच्छी जिंदगी की चाह में
कब्र में लटक गये पैर
अब बैठे है कफन के इंतजार में***
^^^दिनेश शर्मा^^^

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