खुली आँखों के सपने

“खुली आँखों के सपने”
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सत्य है !
कि देखता हूँ मैं भी
खुली आँखों से सपने |
वो सपने ! जो हैं अपने !
भोर में ! दोपहर में !
साँझ और रात में !
देखता हूँ रोज ख्वाब
हर हालात में !!
दर्द में ! तन्हाई में !
दिल की निज गहराई में !
नित-नित देखूँ सपने सुहाने !
मैं बैठ वहाँ अमराई में !!
ध्यान मग्न हो ! निश्छल-निश्छल !
मैं बुनता रहता सपने हरपल |
अपने मन को वश में करता,
सुन्दर सपने निर्णित करता ||
जब एहसास सुखद हो जाते !
अपने दिल को हम समझाते !
देख जरा तू ! सपने सुनहरे
यही बात तो हम बतलाते !
भरकर मन में नई उमंग !
और मानवता के ख्वाब को !
संस्कार बलवान बनाकर
पढ़ते कर्म किताब को ||
निष्काम कर्म पढ़कर गीता में !
चमकाया मन-महताब को |
त्याग-समर्पण अपनाकर
पा लेता स्वर्णिम-आब को !!
नहीं बुराई ख्वाब में कोई
ख्वाब में पर सच्चाई हो !
आँखें चाहे बंद हो लेकिन
दिल में सदा अच्छाई हो ||
अपनी मंजिल राह तकती
अब सपनों की बारी है !
जो सपने देख कर्म हैं करते
उनसे किस्मत भी हारी है ||
विश्वास करूँ मैं हाथों पर
यकीं नहीं है लकीरों में !
जज्बा-जोश-जूनून अगर हो ,
सब मिल जाता तकदीरों में ||
हाथ नहीं होते हैं जिनके ,
उनकी तकदीर भी होती है !
ख्वाब देखकर कर्म वो करते ,
ऐसी तदबीर भी होती है ||
खुली आँख के सपने भी ,
सत्-रज-तमस् से होते हैं !
प्रबलता इनसे बढ़ जाती !
ये ह्यूमस के सम होते हैं ||
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डॉ० प्रदीप कुमार “दीप”
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