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खुद पे विश्वास

पं.संजीव शुक्ल

पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

कविता

December 6, 2017

खुद पे विश्वास….
…………………….

घुट- घुट कर जीना छोड़ दे
हवा के रूख को मोड़ दे
उठना है तुझे अम्बर तक
भरम गीरने का छोड़ दे
हिम्मत को औजार बना
मंजिल की पहचान कर
छोड़ भरम दुनिया का
खुद पे तूं विश्वास कर।

राहो में तूफान मिलेंगे
एक नहीं कईबार मिलेंगे
मुश्किलों के वार कई
तेरे सर पे आन गीरेंगे
डरना नहीं इन बाधाओं से
लक्ष्य का संधान कर
छोड़ भरम दुनिया का
खुद पे तूं विश्वास कर।

पर्वतों को काट कर तू
रास्ते अपना बना ले
कर फतह मंजिलों को
अबकी दुनिया को दिखादे
रुक न जाना पथ में प्यारे
बाधाओं से हार कर
छोड़ भरम दुनिया का
खुद पे तूं विश्वास कर।

हार कर तुम रुक नजाना
अपनी किस्मत खुद बनाना
हाथ की अपनी लकीरें
देखना पर डर न जाना
इन लकीरों से तूं हटकर
कर्म को स्वीकार कर
छोड़ भरम दुनिया का
खुद पे तूं विश्वास कर।
………
©®पं.संजीव शुक्ल “सचिन”
6/12/2017

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Author
पं.संजीव शुक्ल
From: नरकटियागंज (प.चम्पारण)
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।
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