Dec 27, 2020 · कविता
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खुद के लिए जीना सीखा गया “कोरोना”

आठों पहर खूब सोचा ज़माने भर के लिए,

लेकिन खुद के बारे में कभी ना सोचा।

हर किसी की ख्वाहिशें पूरी करने में खूब

परिश्रम, खूब त्याग किया मगर,

खुद की चाहतों का क्या कभी ना सोचा?

घर-गृहस्थी,समाज के लिए वक्त दिया,

मगर खुद को कितना वक्त दिया कभी ना सोचा।

दौलत शौहरत सब जमाने की झूंठी शान है,

खुद के लिए कितना जीता हूं कभी ना सोचा।

“कोरोना काल” में जब ठहर गया घर में,

खुद को वक्त दिया, खुद से मुलाकात की,

तब खुद के लिए भी जीना सीख गया।।

शिव प्रताप लोधी,सतना (म.प्र.)

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SHIVPRATAP LODHI
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शौक़-खूबसूरत दिलों से मिलते रहनें का. View full profile
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