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खुद्दारी

विनोद कुमार दवे

विनोद कुमार दवे

कविता

September 3, 2016

चुप रहकर भले ही तुमन सत्ता से यारी रखते हो,
लेकिन अपने दिल से पूछो,क्या खुद्दारी रखते हो।

जफ़ा ये सहकर तुमने शायद कोई खजाना पाया है,
शायद इन जंजीरो में तुम्हें सुख चैन नज़र आया है,
लेकिन इन सोने चांदी के पिंजरों से बाहर आकर देखो,
खुले हुए अम्बर के तले अपने अपने पर फैलाकर देखो,

परवाज तुम्हारी भारी है क्यों लाचारी रखते हो,
खुद के तुम ही ख़ुदा हो यारो तुम खुद्दारी रखते हो।

Author
विनोद कुमार दवे
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन... Read more
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