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खिल जाती हो...

Mar 28, 2020 02:59 PM

खिल जाती हो तुम कहीं भी क्या तुम्हें शर्म आती नहीं
पानी – पत्थर घाम – शाम क्या तुम्हें डराती नहीं
एक हम हैं जो हुक्कमों से डरते फिरते हैं
जिन को चुन कर लाते हैं उन्हीं से डर कर जी जाते हैं
फिर खिलते हुए खुलते हुए हम शाम- ओ-सहर डर जाते हैं
अपनी अना के मोल पे फिर उनको हम बचाते हैं
एक तुम हो डरती नहीं दरारों में भी खिल जाती हो???
~ सिद्धार्थ

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Mugdha shiddharth
Mugdha shiddharth
Bhilai
841 Posts · 12.1k Views
मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय......
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