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“खामोशी” कविता

Dr.rajni Agrawal

Dr.rajni Agrawal

कविता

July 27, 2017

*खामोशी*
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संवेगों की मौन व्यथाएँ मूक भाव अभिव्यक्ति है दमित चाह ज्यों बंद यौवना चुप्पी साधे दिखती है।

कलकल स्वर में निर्झर बहता
विरह वेदना कह जाता
काँटों से घिर कर गुलाब
मौन बना सब सह जाता।

दुनिया शब्दों को सुनती है
खामोशी की व्यथा नहीं
अंतर्द्वंद्व में जलता है मन
शब्दों में ये बँधा नहीं।

मन के तहखाने चुनी गईं
ज़िंदा लाशें सपनों की
कुछ घुटती सांसें कैद हुईं
कुछ बेरहमी अपनों की।

बेदर्द ज़माना क्या जाने
खामोशी कितनी गहरी है
शब्दों में राज़ नहीं छिपते
खामोशी मन की प्रहरी है।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका- साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी (मो.-9839664017)

Author
Dr.rajni Agrawal
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान भास्कार" सम्मान, "काव्य -रत्न" सम्मान", "काव्य मार्तंड" सम्मान, "पंच रत्न"... Read more
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