कहानी · Reading time: 3 minutes

खान साहब।

एक महिला नेता के अंतर्वस्त्र के रंग का खुलासा कर और उस पर तालियां बटोर कर खान साहब घर पहुँचे तो गर्मी की वजह से बड़ी प्यास लगी थी। बेगम को आवाज लगायी की एक ग्लास खूब ठंडा शर्बत लेकर आएं , बेगम आयीं तो खान साहब सूखे हलक को भूल अपनी बेगम की तरफ हैरत से देखते रह गए। बेगम के जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था। एक दुपट्टा तक नहीं।खान साहब का यह अजीब रवैया देख बेगम बोलीं।

बेगम : क्या हो गया ऐसे क्या देख रहे हो , क्या हुआ ?

खान साहब : शर्म नहीं आती बेहूदा औरत नंगा जिस्म लेकर शर्बत पिलाने आयी हो।

बेगम : गर्मी से दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा । मैं पूरी तरह लिबास में हूँ।

खान साहब भड़क कर बोले : तो क्या मेरी आँखें खराब हो गयीं हैं।

बेगम : बेशक।

खान साहब : मैं भरे बाज़ार से होकर आया हूँ वहां तो मुझे कोई बेलिबास नहीं दिखा।

बेगम : ठीक है लो मैं तुम्हारे करीब आती हूँ , आंखों से नहीं दिख रहा तो हाथों से कपड़े छूकर तसल्ली कर लो।

खान साहब के हाथों ने कुबूला की बेगम बेलिबास नहीं हैं।पर उन्हें ऐतबार नहीँ हुआ और वे तस्दीक करने के लिए घर के अंदर जाने लगे तो बेगम चिल्ला कर बोलीं : अरे बेग़ैरत इंसान अंदर बहु बेटियां हैं मेरी माँ आयी हुईं हैं अगर तुम्हारी निगाह सचमुच ख़राब हो गई हैं तो वे सब भी मेरी तरह बेलिबास ही दिखाई पड़ेंगी। अंदर मत जाओ।
पर खान साहब कहाँ सुनने वाले थे वे तो पूरा बंगला घूम आये और घर की सभी औरतों , लड़कियों को भी बेलिबास देख आये और वापस सोफे पर माथा पकड़ कर बैठ गए।

बेगम : देख लिया सबका जिस्म , हो गयी तसल्ली ।

खान साहब : ये क्या हो गया है मेरी आँखों को सारे मर्द तो लिबास में दिख रहे हैं पर घर की औरतें !

बेगम : मुझे तो लगता है फरिश्तों ने तुम्हे सजा दी है।

खान साहब : पर किस गुनाह की ?

बेगम : जो तुम अभी अभी करके आये हो , जिसके इनरवियर का रंग बताया है वो तुम्हे भाई मानती थी , सालों तुम्हारे दल में रही और अब अलग हो गयी तो उसके बारे में इतनी घटिया बातें । जुबान नहीं जल गई तुम्हारी।

खान साहब : तुम्हे कैसे पता और उस मामूली गुनाह के लिए इतनी बड़ी सज़ा !

बेगम : मैं भी न्यूज देखती हूँ और तुम्हारी निगाह में वह बात मामूली होगी खुदा के लिए नहीं। तुमने अपनी सगी बहन जैसी औरत के बारे में बेहूदा बात की इसलिए ही तुम्हे ऐसी सज़ा मिली है कि तुम्हे गैर की औरतें तो लिबास में नज़र आएंगी पर तुम्हारे अपने घर की औरतें बेलिबास।

खान साहब भड़क कर : बेग़ैरत औरत नंगी खड़ी है और बहस कर रही है । कुछ लाज हया है कि नहीं।

बेगम : मैं कपड़ो में हूँ कैसी शर्म , पर तुम अब भी अपनी बदतमीजी से बाज़ नहीं आ रहे।

खान साहब : क्या करूँ , कहाँ जाऊं , कैसे इससे निजात पाऊं ?

बेगम : कहीं नहीं जाना है , जिस बहन की इज़्ज़त से खिलवाड़ किया है जाकर उसके कदमों में गिर जाओ और माफ़ी मांगो मुझे ऐतबार है तुम्हारी परेशानी खत्म हो जाएगी।

Competition entry: साहित्यपीडिया कहानी प्रतियोगिता
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गीत , मुक्तक , दोहा , ग़ज़ल , छंद मुक्त कविता , कहानी इत्यादि विधाओं में निरंतर लेखन।
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