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ख़यालों में उनके उलझने लगे हैं

अजय कुमार मिश्र

अजय कुमार मिश्र

गज़ल/गीतिका

February 8, 2017

नज़र ये मिली है उनसे ही जबसे
हसरतें तो दिल के सँवरने लगे हैं।
दिल में मेरे तो अब उमंगें जगी हैं
साज तो दिल के भी बज़ने लगे है।
कैसे अब पहुँचे उन तक संदेशा
जज़्बात दिल के पिघलने लगे हैं।
बात कोई भी ज़ेहन में न आती
ख़यालों में उनके उलझने लगे हैं।
काम अब मेरा कोई भी नहीं है
रातों में तारे अब गिनने लगे हैं।
यात्रा कोई भी अब पूरी न होती
पग पग पर हम ठिठकने लगे हैं।
उनकी नज़र से तो ऐसे हैं उलझे
सँवरते सँवरते ही बिखरने लगे हैं।
नजर का हुआ तो ऐसा असर है
चाहत की हद से गुज़रने लगे है।
उनसे तो कोई मिला दे मुझको
साँसे अब मेरे तो थमने लगे हैं

Author
अजय कुमार मिश्र
रचना क्षेत्र में मेरा पदार्पण अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को निखारने के उद्देश्य से हुआ। लेकिन एक लेखक का जुड़ाव जब तक पाठकों से नहीं होगा , तब तक रचना अर्थवान नहीं हो सकती।यहीं से मेरा रचना क्रम स्वयं से संवाद... Read more
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