ख़त्म जो हो वो सफ़र क्या मांगना!

ख़त्म जो हो, वो सफ़र क्या मांगना।
चार कदमो का डगर क्या मांगना।

दे रहें हैं जख्म, अपने ही मुझे,
अब दुआओं में ,असर क्या मांगना।

मौत आनी होगी , तो आ जाएगी,
यूँ किसी से अब जहर क्या मांगना।

तोड़कर घर इन परिंदों के कई,
खुद खुदा से आज घर क्या मांगना।

गांव में भी तो मिलें हमको खुदा,
ए खुदा! तेरा शहर क्या मांगना।

बह रही हो जब नदी इक धार में,
फिर किनारों में लहर क्या मांगना।

जिंदगी तो बस तमाशा है शुभम
आपका इनसे , हुनर क्या मांगना।

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