खलिस (कमी)

कोई प्यासा कुवें के पास, कब जाता है ये समझों,
कब फनकार जीवन का, लुफ्त उठता है ये समझो।
हथेली पर यूँ रख कर जान, जरा एक बार तो कह दो,
कोई सरहद पे कैसे खुद का, सर कटवाता है ये समझो।।

मियां तुम कम हो तो, खुद को यूँ ही कमतर समझो,
ये क्या की खुद न खुद होकर, ख़ुदा की ही तरह समझो।
यूँ तो देखे है हमने कई पय, अमूमन हीरे को तरासने में,
जो खालिस हो उसे भी, एक टका खलिसगर समझो।।

कमी उनमे भी निकली जो, सल्तनतें हिन्द होते थे,
बड़प्पन है इसमें की, खुद की कमियों को तो समझो।
वो जो खामोश रहते थे, भरी महफ़िल में भी अक्सर,
वो जाते जाते कह जाते, मेरे खूबियों को तो समझो।।

©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०६/०२/२०१९ )

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 2 Comment 0
Views 3

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share