दोहे · Reading time: 1 minute

खपरैल. (दोहे)

मिट्टी के खपरैल घर , संजोये हैं गाँव |
वही चर्मराती खाट औ, घने नीम की छाँव ||

गाँवों में अब घर हुए, कितने आलीशान |
मगर कहाँ सबको मिला, है ऐसा वरदान ||

लाली जोते खेत जब, लल्लू बनता बैल |
चटकाती है पीठ नित, टपरी की खपरैल ||

पक्की सडकों पर जले, पगतल का दृढ चाम |
मिले नहीं मजदूर को , मगर गाँव में काम ||

तन-मन से कैसे मिटें , नीले कलुष निशान |
जाति-पाति का भेद जब, लेता है नित जान ||

~ अशोक कुमार रक्ताले.

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