खता

ये बातें उनदिनों की है, अकेला ऊब जाता था।
तेरे यादों में जाने कैसे, अक्सर डूब जाता था।।
की अब हालात मुझको, चैन से सोने नही देता।
मेरे हाँथो में मोबाईल, अकेला होने नही देता।।

मैं कैसे मान लू तूने, सज़ा मेरी है कम कर दी।
सजा दी है ऐसी की, जिंदगी में है गम भर दी।।
खता तो होती जब तेरी कोई, रजा होने नही देता।
वो बख़्सि होती मौव्वत जो, सजा होने नही देता।।

थके राही से ना पूछो, सफर अब और कितना है।
अगर मंजिल हो बोझिल तो, मंजर और कितना है।।
तजुर्बे ने किया परेशां फिर, बच्चा होने नही देता।
है डरता रहता इतना कि, मजा होने नही देता।।

©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०६/०२/२०१९ )

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