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खंजर देख ना कटार देख

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

November 29, 2016

खंजर देख ना कटार देख
तू क़लम देख और धार देख

आई नहीं ख़बर इक तेरी
हर दिन आता अख़बार देख

दिल के दरीचे खोल के रख
खुद को तारों में शुमार देख

ले लिया है मुझसे पंगा
अब बचने के आसार देख

बुरा -बुरा सबको कहता है
पहले अपना व्यवहार देख

नहीं नौकरी बस की तेरे
चल कोई व्यापार देख

दिल लगाते वक़्त ना देखा
अब हर घड़ी इंतज़ार देख

बेटियों को खिलने दे फिर
घर आँगन में बहार देख

बाँट -बाँट कर खाया सबने
‘सरु’मुफ़लिसी में प्यार देख

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Author
suresh sangwan

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