Sep 8, 2016 · कविता
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क्षुद्रिकाएँँ

दुश्‍मनी
*****
दु:स्‍वप्‍न सा भर के
गरल आकंंठ
दोनों आखों में ले
तडि़त सौदामनी।

संकल्‍प
*****
संस्‍कार कल्‍प
बदल दे कलेवर तन का
कर ले प्रण उठा के
कुलिश विकल्‍प।

बसन्‍त
****
बस अंत
सभी दर्द, व्‍यथा, घृणा,
द्वेष, दम्‍भ,स्‍वार्थ और
भष्‍टाचार का।
बस अंत, बस अंत
तभी सार्थक बसन्‍त।

प्रेम
***
मन का आह्लाद
प्रीत के निकषण में नेह निनाद
एक चुम्‍बकीय आकर्षण
एक सुखद अनुभूति
जीवन की गूँज और
मौन अभिव्‍यक्ति।

जीवन
*****
‘जी’ ‘वन’ चाहे
‘जीव’ ‘न’ चाहे,
‘जी’ ‘व’ ‘न’ की द्विविधा में
‘जीवनद्ध बीता जाए।

अतिथि
******
अतिथि वो,
जिसके आने की
तिथि
तय न हो।

सत्रह शत्रु हार
**********
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह,
मत्‍सर रिपु के संचार।
द्वेष, असत्‍य, असंयम, गल्‍प,
प्रपंच और करे संहार।
स्‍तेय, स्‍वार्थ, उत्‍कोच, प्रवंचना,
सर्वोपरि विष अहंकार।
जो धारे ये अवगुण सब के सब
सत्रह हैं शत्रु हार।।

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Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul'
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1970 से साहित्‍य सेवा में संलग्‍न। अब तक 14 संकलन, 6 कृतियाँँ (नाटक, काव्‍य, लघुकथा,... View full profile
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