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** क्षणिका **

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

June 9, 2017

ऐ चाँद मेरे
मैं तुझ तक
पहूंचूं कैसे
निगलने को है
बादल परछायी मेरी
डसने को नागाकृति
बहुत विकल है
चल आ
अब ज़मी पर
उतर मुझसे मिल
अरे यूं
मुस्कुराता क्यूं है
मेरी मजबूरियों को समझ
या फिर
मैं गाऊं बादल राग कोई
और
आग लग जाये
इस अवरोध पथ में
तुम पिघल कर
मुझसे आ मिलो
या फिर
आग की भेंट चढ़ जाओ तुम
और मैं मुस्कुराऊँ
अपनी विवसता पर
क्या ये
तुमको अच्छा लगेगा
और मेरे
हृदय की शीतल आग
कभी शांत हो पायेगी
तुम्हारे बिना
?मधुप बैरागी

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Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल 13.7.2017 स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना... Read more

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