क्षणिकायें

सर्दी की धूप
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मेरा आँगन
और मै ,
दोनों ही परेशान हैं!
धूप के न आने से!!
मैने कंबल ओढ़ा,
आँगन ने कोहरा,
रात सिकुड़ती रही,
ठिठुरती रही,
कभी अलाव की,
कभी सूरज की तपिश,
की तलाश में,
तड़पती रही
फ़्लू के डर से,
पक्षी नहीं चहके,
कुछ दिन से,
सवेरा भी नहीं हुआ।।
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राजेश’ललित’
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जवाबों के दायरे
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सवालों के साये;
जरा लंबे हो गये।
जवाबों के दायरे;
सिकुड़ कर रह गये।
तीखे सवाल मना हैं!!
जो जवाब दिये,
वो गलत समझे गये!
जवाबों का मतलब,
वह नहीं था,जो कहा था!
जवाबों का मतलब,
वो,जो उनके मन में था!
सवालों की उलझन!!
जवाबों का जाल बुन!!
ज्यों के त्यों रहे जनाब;
न सवाल पूछो;न जवाब सुनो।
चलते बनो;चलो न।
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राजेश’ललित’
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दिनों बाद
हँसा मैं
पोते के साथ
नाचा मैं
बाहर निकला
तो ख़ुश था
लोगों ने
वजह पूछी
ख़ुश होने की
मैं कसमसा कर
रह गया
पोते की
हंसी के साथ हंसी
क्या वजह नहीं ??
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राजेश’ललित’

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मैंने हिंदी को अपनी माँ की वजह से अपनाया,वह हिंदी अध्यापिका थीं।हिंदी साहित्य के प्रति...
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