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क्रोंच विरह से निकली कविता,हर उर की भाषा बन आयी हो…

अरविन्द दाँगी

अरविन्द दाँगी "विकल"

कविता

March 21, 2017

क्रोंच विरह से निकली कविता,हर उर की भाषा बन आयी हो।
मन के भावों की तुम भाषा,हर मन व्यक्त कर पायी हो।
जीवन का हर राग रचा,अभिव्यक्त सहज सब कर आयी हो।
हर्ष-विरह-श्रंगार सभी रस,जनभाषा तुम कहलायी हो।
वेदों से लेकर पुराण गढे सब,क्रांति की वाणी बन पायी हो।
कविता तुम रहती हर उर में,नैनो की भाषा पढ़ आयी हो।
कभी रचती तन्हा मन को,कभी बावरी कहलायी हो।
कभी प्यास बन चातक चुनती,कभी प्रेम की राधा बतलायी हो।
कहता “विकल” तुम बिन क्या मै,जीवनसार तुम बन आयी हो।

✍कुछ पंक्तियाँ मेरी कलम से : अरविन्द दाँगी “विकल”

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Author
अरविन्द दाँगी
जो बात हो दिल की वो कलम से कहता हूँ.... गर हो कोई ख़ामोशी...वो कलम से कहता हूँ... ✍अरविन्द दाँगी "विकल"

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