क्रांतिकारी मुक्तक

बहर- *१२२२ १२२२ १२२२ १२२२*

कभी अंग्रेज़ का हमला, कभी अपने पड़े भारी।
कभी तोड़ा वतन को भी, कभी गद्दार से यारी।
कलम का क्रांतिकारी हूँ, यही सब आग लिखता हूँ,
नमन शोला उगलता है, कलम संगीन-सी प्यारी।

नमन जैन नमन

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