Nov 6, 2018 · कविता
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क्यों मकानों में किसी माँ का मिला कंकाल है!

पूजनीया माँ थी क्यों अब बन गयी जंजाल है।
क्यों मकानों में किसी माँ का मिला कंकाल है।

डाकटर इंजीनियर अफ़सर बड़े पढ़कर हुए।
आज पैसे-नौकरी परदेश क्यों बढ़कर हुए।
कुछ अलग तो बातों ही बातों में यूँ लड़कर हुए।
बीवियों के तंज से बेमन से ही चढ़कर हुए।
घर रहा मंदिर अब तक हाल क्यों बेहाल है।
क्यों मकानों में किसी माँ का मिला कंकाल है।

अपनी बीबी बच्चे पलते माँ नहीं पलती है क्यों।
खर्च कुत्तों पर हजारों माँ की ही खलती है क्यों।
जिसने था चलना सिखाया लड़खड़ा चलती है क्यों।
उम्र भर रोशन किया घर, दिल ही दिल जलती है क्यों।
ख़ुद को जीवन भर खपाया आज क्यों बदहाल है।
क्यों मकानों में किसी माँ का मिला कंकाल है।

कहते हैं ईश्वर स्वरूपा माँ का ही किरदार है।
है धरा उनसे ही जन्नत पाँव स्वार्गिक द्वार है।
आधुनिकता लीलती रिश्ते जो अब व्यापार है।
माँ जो अपमानित हुई फिर व्यर्थ ही संसार है।
माँ नहीं तो कुछ नहीं है स्वर्ग भी पाताल है।
फ़िर मकानों में किसी माँ का मिला कंकाल है।
अनंत महेन्द्र

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