क्यों शिकवा मैं नींद से करूँ

क्यों शिकवा मैं नींद से करूँ
जो आती नहीं मुझे रात भर
कसूर तेरे सुंदर चेहरे का है
जो मुझे जगाता है रात भर

यादें तेरी जो भूलने नहीं देती
चेहरा धुँधला होने नहीं देती.
झकझोरती रहती हैं उर को
जो रहती सताती हैं रात भर

हद बेहद याद आती हो तुम
आँखों में छाई रहती हो तुम
नासूर बन गए हो प्रिय तुम
जो चीस देती रहती रात भर

क्या करूँ चैन नहीं हर पल
पागल दीवाना फिरूँ हर पल
देखो मोहब्बत का यह असर
सोता नहीं जागता रात भर

लोग मजनू मुझे हैं कहने लगे
मर ना जाए कहीँ ये कहने लगे
लैला मेरी मिले तो कहना उसे
जुदाई में तड़फता रहा रात भर

क्यों शिकवा मैं नींद से करूँ
जो आती नहीं मुझे रात भर
कसूर तेरे सुंदर चेहरे का है
जो मुझे जगाता है रात भर

सुखविंद्र सिंह मनसीरत

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