कविता · Reading time: 1 minute

क्यों रोता है चिल्लाता है

क्यों रोता है चिल्लाता है
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ये जीवन भी क्या बंजारा
कुछ दिनो को ही रुक पाता है
फिर छोड़ सभी कुछ यहीं कहीं
नई राहों पर बढ़ जाता है

है कौन भला इस दुनियाँ में
जो रहने सदा को आया है
कुछ रोज का है ये खेल सभी
फिर छोड़ यहीं सब जाता है

इस ज़मीं पे जाने कब से हैं
ये जंग ज़मीनों की खातिर
लेकिन सबको ही ये टुकड़ा
बस दो गज़ ही मिल पाता है

क्या लाए थे जो छूट गया
बस चार दिनों का डेरा था
यहाँ ठेकेदार सराय का
बस कुछ दिन ही ठहराता है

फिर से होगा इक नया सफर
फिर से होंगी अंजान डगर
कोई नया बसेरा फिर होगा
क्यों रोता है चिल्लाता है

सुन्दर सिंह
09.01.2017

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