क्यों डरते हैं हम, करने से सच का सामना!

डरते हैं हम क्यों,करने से सच का सामना!
क्यों नही चाहते,हम उस सच को जानना!
आया है जो आज हमारे समुख, चाहता है वह यह जतलाना!
मैं ही हूँ एक शाश्वत सत्य, हूँ नहीं मैं तेरी चाहना !
तूने जो बना रखी है अपने मन में एक ऐसी धारणा!
और उसी के इर्द गिर्द घूमती रहती है, तेरी अपनी भावना!!

जब कभी भी सच को तुने,अपने अनुकूल नही पाया है!
तभी हो गया है तू विचलित,और तूने उसको झूठलाया है!
नहीं किया है भरोसा उस पर, अविश्वास उस पर जतलाया है!
लड गया तू अपने से ही,,अपनों से भी तू भरमाया है!
क्योंकि,
तूने बना रखी है ,अपने मन-मस्तिष्क में एक धारणा!
और उसी के इर्द गिर्द घूमती रहती है तेरी अपनी यह भावना!!

आज उसी दौर में हैं हम, कैसे यह जीवन बचेगा!
रोग विकट है,उपचार है सीमित,कितनो तक यह पहुँचेगा!
और साथ में है यह भी एक संकट, कैसे यह पेट भरेगा!
भय है,भूख है,और नहीं ठौर ठिकाना,कैसे यह संताप कटेगा !
हम तो हैं खुद से ही लाचार,और हम पर ही दोष मढेगा !
हम ही हैं इस रोग के वाहक, ऐसे कैसे फिर काम चलेगा !
क्योंकि बना ली है तुमने अपने मन-मस्तिष्क में यह धारणा!
हम ही हैं इस रोग के वाहक, है तुम्हारी अब यही भावना!!

मृत्यु तो है अपनी सहचरी, हर हाल में है उसका आना!
चाहे मरें हम भूख-प्यास से,या रोग ही हो बहाना!
और मर जाते हैं अपने काम पर भी,हो जाए जब दुर्घटना!
काम रहे अपने हाथों में,सदा रहती है यही कामना!

जब कभी रहते हैं खाली हाथ,तो यह भी है अपना मर जाना!
काम करना है जरूरत अपनी,बिना काम के मुश्किल है रह पाना!
ना मिले काम जो, तो,तब भी तय हैअपना मरना !
वह भूख से हो,या फिर रोग से हो,या फिर दुर्घटना में ही मरना!
या फिर किसी अभाव में रह कर आत्महत्या कर लेना !
क्योंकि, हर किसी के लिए तो , नही कोई मोल है अपना!
यही बना रखी है सबने,अपने-अपने मनोभावों की धारणा!
वर्ना अपने लिए भी बनाई जाती ,कोई योजना !
नहीं भटक रहे होते,सड़कों पर,स्टेशन पर,! या ,
फिर नदी नालोंं के पुलों के नीचे लिए आश्रय! ,
भूख-प्यास से इतना तो तुम भी सोचना!
क्यों डरते हो इस कटु सत्य से ,! कर भी लो जरा इस सच का सामना!
बना रखी पहले ही आपने, हमसे एक सामाजिक दूरी!
और अब तो आह्वान ही हुआ है,बनाने को सामाजिक दूरी!
इसको यह भी तो कह सकते थे, रखनी होगी मानव को मानव से एक निश्चित दूरी!
पर अपने भाग्य में ही हो जब यह सब,तो तब हो जाती है हर आशंका पूरी !
यही हकीकत है आज सामने, कर सकोगे क्या तुम इस सच का सामना !! एक बार सोचना जरूरी!!

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सामाजिक कार्यकर्ता, एवं पूर्व ॻाम प्रधान ग्राम पंचायत भरवाकाटल,सकलाना,जौनपुर,टिहरी गढ़वाल,उत्तराखंड।
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