कविता · Reading time: 1 minute

क्यों कदम ऐसा उठातें हो….

सुख दुःख आते जाते,
फिर क्यों इतना घबराते,
क्यों नहीं थोड़ा सोचते,
क्यों नहीं संघर्षों से झूझते,

चींटी भी जब पहाड़ चढ़ती,
कितनी ही बार फिसलती,
हर बार ले उत्साह आगे बढ़ती,
फिर मंजिल उसको मिलती,

यह तन हैं माता पिता की देन,
फिर क्यों नष्ट करते होकर यूँ बेचैन,
नजर उठाकर देखो संसार में,
कितने जीते हैं अपनी हार में,

परिवार के तुम होते प्यारे,
माँ बाप के आँखों के तारे,
कितने होते कर्ज चुकाने,
कितने होते फ़र्ज़ निभाने,

एक छोटे से बहाव में,
सुख दुःख के घाव में,
क्यों कदम ऐसा उठाते हो,
अपनों को आँसू दे जाते हो,

हर्ष पाने को संघर्ष करो,
मन में थोड़ा उत्साह भरो,
असफलता से क्या डरना,
लड़ने से पहले पीछे क्यों हटना,

वेद पुराण सब यही सुनाते,
ऋषि मुनि भी यही गाते,
बड़े भाग से मानुष तन पाते,
फिर भी क्यों नहीं कुछ सोचते,

यह समय बीत जाएगा,
नव प्रभात फिर होगा,
थोड़ा धैर्य रख लीजिए,
थोड़ा इंतजार कीजिए,

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