क्योंकि मैं एक नारी हूँ

कुछ लोग कहते हैं मैं ऐसी हूँ
कुछ कहते हैं मैं वैसी हूँ

कुछ ये भी बातें करते हैं कि
मैं कैसी दिखती हूँ, कैसे हँसती हूँ
मैं क्या पहनती हूँ, कैसे बातें करती हूँ

और तो और
कुछ लोग तो ये भी बातें बनाते हैं कि
मैं किससे मिलती हूँ, कहाँ कहाँ जाती हूँ

कभी कभी मुझे बड़ी जोर की
हँसी भी आती है उन लोगों पर
और उनकी बेसिर पैर की बातों पर

जो लोग मुझसे एक भी बार नहीं मिले
मुझे देखा भी नहीं
मुझे जानते नहीं, मुझे पहचानते नहीं
उन्हें कैसे पता चला कि मैं कैसी हूँ?

कभी कभी मैं ये भी सोचती हूँ
क्या उन लोगों के पास इतना व्यर्थ का समय है
कि किसी के बारे में कुछ भी कहते रहते हैं

क्यों नहीं झांकते वो लोग
खुद के अंदर, खुद के मन में
क्यूँ नहीं दिखती उन्हें
खुद के अंदर की, अपने मन के
कोने कोने में छिपी एक स्त्री के लिए गन्दगी

यूँ ही सोचते सोचते
फिर ये भी विचार आता है
कि शायद मैं सबसे अलग हूँ
कुछ ऐसी जैसा कोई नहीं

और वो सभी लोग
जो मेरे बारे में अनर्गल बातें करते हैं
उन्हें मैं वैसी ही लगती हूँ
जैसा उनका मन
मेरे बारे में सोचता रहता है
जैसा उनका मन
मुझे देखना चाहता है

लोधी डॉ. आशा ‘अदिति’
भोपाल

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