क्योंकि माँ तो, माँ होती है ।। - कवि आनंद

धरती के रज से बालक का, जब प्रथम समागम होता है ।
कोई बच्चा, इस दुनिया को , जब देख ठिठक कर रोता है ।।
होकर उल्लासित माँ, उसको तत्क्षण ही गले लगाती है ।
अपनी ममता निर्झरिणी का, हर पल आभास कराती है ।।
उसकी आँखों में दुनिया का, हर सुन्दर स्वप्न संजोती है ।
क्योंकि माँ तो, माँ होती है ।।
सिखलाती है प्रति क्षण- प्रतिपल, निज पैरों पर चलना उसको ।
अपने कर्मों की ज्वाला में ही, हर क्षण-क्षण जलना उसको ।।
शिक्षा की पहली सीढ़ी से, तालिमो का अनवरत सफर ।
सिखलाती है हँसते रहना, सुख में या दुःख में जीवन भर ।।
हर बीज सफलता का प्रतिपल, बेटे के मन में बोती है ।
क्योंकि माँ तो, माँ होती है ।।
कहती है मानवता बेटे, मजहब से हरदम ऊपर है ।
क्या भेद जाति या वंशों में, काया सबकी यह नश्वर है ।।
है सदा पराजय ही अच्छी, छलयुक्त विजय से गरिमामय ।
तू लाख करे सौदा तन का, अंतस का मत करना विक्रय ।।
माँ की ममता की आभा में, फीकी हर सुन्दर मोती है ।
क्योंकि माँ तो, माँ होती है ।।

—– कवि आनंद

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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