कविता · Reading time: 1 minute

क्योंकि मरना तुम्हारी हद हैं!

आँखे फाड़
लक्ष्य को ताड़,
जिद पर अड़
दुःखों से लड़,
काटों पर चलना तुम्हारी ज़द हैं
क्योंकि मरना तुम्हारी हद है !

सुखों को छोड़
नाता दुखों से जोड़,
संघर्षो में ख़ुद को तपने दे
दिखा कुछ चिंगारी,
और धुंआ सा निकलने दे
अब आंसू नही, पसीना तुम्हारी नद है
क्योंकि मरना तुम्हारी हद है!

दुश्मनों की परवाह छोड़
खुद को लोहे से तपा
सरिये सा मरोड़
ईर्ष्या की छाती पर पैर
प्रेम की कर होड़
रुकता नही कभी , तुम्हारा आसमा सा कद है
क्योंकि मरना तुम्हारी हद है!

-© नीरज चौहान

133 Views
Like
Author
65 Posts · 23.2k Views
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।
You may also like:
Loading...