.
Skip to content

क्योंकि,मैं जो हूँ स्वतः हूँ..!

रीतेश माधव

रीतेश माधव

कविता

April 29, 2017

क्योंकि,मैं जो हूँ स्वतः हूँ..!

स्वयं रचता हूँ स्वयं पढता हूँ,
आप पढ़ो तो ठीक है..
वरना खुद ही पाठक हूँ,
क्योकि, मैं जो हूँ स्वतः हूँ।
खुद गढ़ता हूँ शब्दो को,कुम्हार सा,
पिरोता हूँ शब्दो को,मोतियों की माला सा.
आप महसूस करो तो ठीक है..
वरना खुद की कृति से बेसुध सा हो जाता हूँ,
क्योकि, मैं जो हूँ स्वतः हूँ।
खुद की कल्पना का आकाश बनाता हूँ,
खुद ही नदी सा बहता जाता हूँ,अविरल!
आप महसूस करो या ना करो..
मै मदहोश सा डूब जाता हूँ,
क्योकि मैं जो हूँ स्वतः हूँ।

आप अचंभित सा हो जाते हो,
विचलन में डगमगाते हो..
अविश्वास की डोर जो पकड़े हो,
आत्मविश्वास खून सा दौड़ता मेरे रगों में…
खुद का विश्वास खुद जगाता हूँ,
क्योकि मैं जो हूँ स्वतः हूँ…..

Author
Recommended Posts
अलबेला हूँ
अलबेला हूँ ! भीड़ में खड़ा हूँ, फिर भी अकेला हूँ कदाचित इसीलिए मै अलबेला हूँ ! ! शोरगुल में धँसा पड़ा हूँ आफतो में... Read more
मैं शक्ति हूँ
" मैं शक्ति हूँ " """""""""""" मैं दुर्गा हूँ , मैं काली हूँ ! मैं ममता की रखवाली हूँ !! मैं पन्ना हूँ ! मैं... Read more
मुक्तक
कभी कभी मैं खुद से पराया हो जाता हूँ! दर्द की दीवार का एक साया हो जाता हूँ! जब बेखुदी के दौर से घिर जाता... Read more
विचलित सा मन
विचलित सा मन है मेरा कभी तरु छाया के अम्बर सा कभी पतझड़ के ठूंठ सा कभी प्रसन्न मैं,कभी दुखी क्रोधित सा मैं भींगा-भांगा सा,डरा... Read more