क्योंकर जलाये वो, कुछ ख़त ...

क्योंकर जलाये वो, कुछ ख़त महब्बत के
लिखवाये हसरत ने, जो तेरी चाहत के

अब भी ज़हन में हैं, बेशक जले अक्षर
वो शब्द उल्फ़त के, मजरूह निस्बत के

अफ़साने क़ातिल के, क्या खूब उभरे हैं
मुझको सुनाने हैं, क़िस्से अदावत के

बीमार को जानाँ, क्योंकर सताते हो
मशहूर हैं क़िस्से, तेरी नज़ाकत के

था तेरी नफ़रत में, जज़्बात का जादू
जी भर के देखूँ मैं, ये सुर बग़ावत के

है पाक उल्फ़त तो, डर इश्क़ से कैसा
कल लोग ढूंढेंगे, क़िस्से सदाक़त के

नाहक जिया डरकर, मैं तेरी चाहत में
घुटते रहे अरमाँ, यूँ दर्दे-उल्फ़त के

क्यों धुँद-सी छाई है, क्यों अजनबी हैं हम
क्या आप थे पंछी, इस प्रेम परवत के

क्यों देखकर उनको, होती नहीं राहत
क्या आ गया कोई, फिर बीच ग़फ़लत के

क्यों छीन ली मुझसे, सारी ख़ुशी तुमने
मुझको दिए हैं ग़म, क्यों तूने फ़ितरत के

क्यों पी न पाया मैं, बहते हुए आँसू
क़ाबिल नहीं था क्या, मैं तेरी फुरक़त के

तुमको नहीं उल्फ़त, तो छोड़िये साहब
पर सुर नहीं अच्छे, ऐ यार नफ़रत के

मंज़िल नहीं कोई, हैं मोड़ ही आगे
जाएँ कहाँ दिलबर, अब मारे क़िस्मत के

जब नाखुदा किश्ती, तूफ़ान में डूबे,
कैसे बढ़ें आगे, हम टूटी हिम्मत के

था इश्क़ में मेरा, ऊँचा कभी रुतबा
माना नहीं क़ाबिल, मैं आज अज़मत के

जी भर के रोये थे, बरसात हो जैसे
वो कष्टदायी पल, वो लम्हे रुख़्सत के

नीलाम था शा’इर, वो प्यार मुफ़लिस का
जज़्बात बे’मानी, दिन हाय! ग़ुर्बत के

थी ज़िन्दगी रोशन, तुम साथ थे मेरे
वो रौशनी खोई, अब बीच ज़ुल्मत के
•••
____________
(1.) मजरूह — घायल, आहत, ज़ख्मी।
(2.) निस्बत — लगाव; संबंध; ताल्लुक।
(3.) अदावत — शत्रुता, बैर, दुश्मनी।
(4.) जानाँ — प्रेमपात्र, महबूब, प्रेमिका, प्रेयसी।
(5.) सदाक़त — सत्यता, सच्चाई।
(6.) ग़फ़लत — असावधानी, बेपरवाही, अचेतनता, बेसुधी।
(7.) फ़ितरत — स्वभाव, प्रकृति, चालाकी, चालबाज़ी।
(8.) फुरक़त — वियोग, जुदाई।
(9.) नाखुदा — मल्लाह, नाविक।
(10.) अज़मत — बड़ाई, महिमा, गौरव।
(11.) रुख़्सत — बिछड़ना, विदा होना।
(12.) मुफ़लिस — ग़रीब, निर्धन।
(13.) ग़ुर्बत — परेशानी होना, दरिद्रता।
(14.) ज़ुल्मत — अंधकार, तम, तिमिर, अँधेरा, तारीकी।

[ग़ज़ल का मीटर — मुस्तफ़्यलुन + फेलुन + मुस्तफ़्यलुन + फेलुन / 2212 + 22 + 2212 + 22]

—नई दिल्ली

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