कविता · Reading time: 1 minute

क्यू नही!

रो कर मुश्कुराते क्यू नही
रूठ कर मनाते क्यू नही

अपनों को रिझाते क्यू नही
प्यार से सँवरते क्यू नही
देख कर शर्माते क्यू नही
अहम से निकलते क्यू नही

सपनो को सजाते क्यू नही
ख्वाबो को सच करते क्यू नही
कर्मो में तूफान लाते क्यू नही
किताबो से दोस्ती बनाते क्यू नही
मुकद्दर से लड़ते क्यू नही

हार कर जीतते क्यू नही
खुदा से डरते क्यू नही
मुश्किलों को हरते क्यू नही
जिंदगी लोगो की सँवारते क्यू नही

किसी को अपना बनाते क्यू नही
किसी को दिल से लगाते क्यू नही??

®आकिब जावेद

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