23.7k Members 49.9k Posts

*क्यूं*

कर रहा क्यूँ आदमी अभिमान है
जब ठिकाना आखिरी शमशान है
चार दिन की चाँदनी है सब यहाँ
बन पड़ा फ़िर आज क्यूँ शैतान है
आजकल इंसान ही क्यूँ गुम हुआ
सो गया सा अब लगे भगवान है
फूल सा मन दे रहा है ये सदा
पा रहेंगे मंजिलों को भान है
धन की चाह है बसी हर एक मन
हो चला क्यूँ सच से भी अन्जान है
आग में ये नफ़रतों की जल रहा
प्रीत का तो सिर्फ इक अरमान है
*धर्मेंद्र अरोड़ा*

Like Comment 0
Views 6

You must be logged in to post comments.

LoginCreate Account

Loading comments
धर्मेन्द्र अरोड़ा
धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर पानीपती"
पानीपत
92 Posts · 3.2k Views
*काव्य-माँ शारदेय का वरदान * Awards: विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित