*क्यूं*

कर रहा क्यूँ आदमी अभिमान है
जब ठिकाना आखिरी शमशान है
चार दिन की चाँदनी है सब यहाँ
बन पड़ा फ़िर आज क्यूँ शैतान है
आजकल इंसान ही क्यूँ गुम हुआ
सो गया सा अब लगे भगवान है
फूल सा मन दे रहा है ये सदा
पा रहेंगे मंजिलों को भान है
धन की चाह है बसी हर एक मन
हो चला क्यूँ सच से भी अन्जान है
आग में ये नफ़रतों की जल रहा
प्रीत का तो सिर्फ इक अरमान है
*धर्मेंद्र अरोड़ा*

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