क्यूं मानवता बेच रहे हों

+++ क्यूं मानवता बेच रहे हो
******************
मानव होकर क्यूं, मानवता बेच रहे हो
जान पूछ कर, जानें क्या -क्या देख रहे हो

कहां सो गई बोलो तो संवेदनाएं तुम्हारी
मानवता की आंह!पर, हाथ तुम सेक रहे हो

क्या तुम में और जानवरों में ,कोई नहीं हैअंतर
जो तुम नफरत वाले ,मंत्र यूं फूंक रहे हो

डरा- डरा सा तुमने, सब कुछ कर डाला है
रिश्तो को भी ,तुम दुश्मन सा देख रहे हो

इतना भी भटकाव ,नहीं अच्छा है यारा
मानव होकर, जो मानवता लूट रहे हो

ईश्वर की सबसे सुन्दर, तुम ही हो आकृति
फिर क्यों *”सागर”* सच से इतना भाग रहे हो ।।
——–
मूल रचनाकार ..बेखौफ शायर
डॉ.नरेश कुमार “सागर”
*प्रमाणित किया जाता है कि प्रस्तुत रचना रचनाकार की मूल व ए प्रकाशित रचना है ,जो केवल आपको ही भेजी गई है।*

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 2 Comment 1
Views 32

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share