क्या होगा

सबब-ए-गम जमाने को, बताने से क्या होगा
कर पाए न कुछ अपने तो,बेगाने से क्या होगा

अंधेरा हो अगर,दिल ही में,छाया हुआ यारों
भला फिर घर में चराग,जलाने से क्या होगा

ना आएगा कोई,अब यहाँ,मेहमान बन कर
उजड़े हुए आशियाने को,सजाने से क्या होगा

खफ़ा हो बैठा हो जब,खुद मुकद्दर ही हमसे
फिर रुठे हुए लोगों को,मनाने से क्या होगा

लगी है आग जो दिल में,ना बुझ पाएगी ऐसे
तन्हाई में आब-ए-चश्म,बहाने से क्या होगा

सजा येभी नहीं कम के,अरमान मिटगए सारे
दिल-ए-फ़िदाई को और,सताने से क्या होगा

बंजर हो चुकी,जमीन-ए-दिल,ऐ “अश्क”अब
दरख्त ख्वाबों के नए, लगाने से क्या होगा

अरविन्द “अश्क”

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