क्या हम दोनों वही तो नही...

कहीं हम दोनों वही तो नही…
जो प्रेम के छनिक उफान में
बहने को हो आतुर …
एक दूसरे के बांहों में सूखे झरने
की शीतल छाँव की तलाश में
एक दूसरे को निहार रहे हों
सदियों से सदियों तक
और देह के गंध में घुल जाने को हो आतुर
कहीं हम दोनों वही तो नही…
जो एक रात अपना सर्वस्व
अपने देह में उठती प्रेम की ज्वाला
सेज की जीनत पे भेंट चढ़ाने को हो आतुर
कि प्रेम देह की देहरी से होते हुए
अपने उनवान को हो प्राप्त
कि सेज की सलवटों के साथ ही उतर जाय
प्रेम की बेशुमार ख़ुमारी …और
प्रेम के नाम पे रह जाय बस बासीपन
एक दूसरे को देख आने लगे उबासीपन
अगर हम वही हैं तो…?
अगर हम शरीर की भूख में लिपटे हुए
नर और मादा ही हैं…तो
हमें सीखना होगा प्रेम करना
निश्छल और अगाध प्रेम …
…सिद्धार्थ

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