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क्या सचमुच शहर छोड़ दिया

शिवदत्त श्रोत्रिय

शिवदत्त श्रोत्रिय

कविता

August 16, 2016

अपने शहर से दूर हूँ,
पर कभी-२ जब घर वापस जाता हूँ
तो बहाना बनाकर तेरी गली से गुज़रता हूँ

मै रुक जाता हूँ
उसी पुराने जर्जर खंबे के पास
जहाँ कभी घंटो खड़े हो कर उपर देखा करता था

गली तो वैसी ही है
सड़क भी सकरी सी उबड़ खाबड़ है
दूर से लगता नही कि यहाँ कुछ भी बदला है

पर पहले जैसी खुशी नही
वो खिड़की जहाँ से चाँद निकलता था
अब वो सूनी -२ ही रहती है मेरे जाने के बाद से

मोहल्ले वालो ने कहा
कि उसने भी अब शहर छोड़ दिया
शायद उसे इंतेजार करना उसे कभी पसंद ही ना था..

क्या सचमुच शहर छोड़ दिया?

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Author
शिवदत्त श्रोत्रिय
हिन्दी साहित्य के प्रति रुझान, अपने विचारो की अभिव्यक्ति आप सब को समर्पित करता हूँ| ‎स्नातकोत्तर की उपाधि मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान से प्राप्त की और वर्तमान समय मे सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर मल्टी नॅशनल कंपनी मे कार्यरत... Read more

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