क्या यही जीवन है

कभी-कभी सोचता हूँ,
जीवन क्या है ?
भोर हुआ
पतझड़ आया
सब भगे जा रहे हैं,
रुकने का नाम
कोई नहीं ले रहा,
क्या यूँ ही अनन्त की ओर दौड़ लगाना
जीवन है ?
….
कभी-कभी सोचता हूँ,
अपने कौन हैं ?
और पराए कौन,
परन्तु मिलता है एक शून्य
सभी अपने पराये लगते हैं
और कभी-कभी
पराए अपने,
क्या यही आँख-मिचौली
जीवन है ।
…..
कभी-कभी सोचता हूँ,
क्या अपने-पराए
के इस असह्य दर्द में
बिलबिलाने का नाम
जीवन है ।
…..
तभी,
अनन्त से एक आवाज आती है
नहीं !नहीं !!नहीं !!!
दूसरे के दर्द से
तड़प उठना ही
जीवन है ।

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