Apr 10, 2020 · कहानी

क्या में बदल गई

-: क्या में बदल गई :-

आज पूरे 23 बरस हो गए मुझे यहां बड़े पापा के घर रहते रहते, आइने के सामने बाल बनाते हुए मुझे याद आया, इन सालो में मुझे कभी ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि में कहीं ओर हूं, आज कॉलेज के लिए तैयार होते होते अचानक से ऐसा ख्याल आना पहले तो कभी नहीं हुआ ऐसा , में थोड़ी देर वही पास रखे पलंग पर बैठ गई ।कुछ देर ऐसे बैठे बैठे मन में कुछ अजीब सा होने लग गया , ये क्या हो रहा था मेरे साथ, कुछ भूल तो नहीं रही हूं । पास रखे पानी के गिलास से पानी पिया ओर अपने माथे पर आए पसीने की बूंदों को पूछने लगी , इतने में ही पास रखे मोबाइल की आवाज ने मुझे खुद से जगा दिया । देखा तो दीक्षा का फोन था , वो बोली आज कॉलेज नहीं आना क्या मैडम ,टाइम देखा है कितना लेट हो गया है आज, थोड़ी देर चुप रहकर में बोली नहीं आज तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है तू चली जा , ओर हा मेरी क्लास भी तू ही हैंडल कर लेना । इतना कहकर मैने फोन रख दिया ओर वही बिस्तर पर लेट गई । ऊपर चलते पंखे को एक टक देखने लगी ।
ओर फिर मुझे यादों ने अपनी ओर खींच लिया , मुझे याद आया आज पापा का जन्मदिन है 9 अप्रैल आज ही के दिन मैने पापा से बड़े पापा के पास कुछ दिन रहने की ज़िद की थी । जब से हम छुट्टियों में बड़े पापा के यहां आए थे वापस गए ही नहीं । मुझे क्या पता था ये कुछ दिन मेरे 23 बरस के बराबर होंगे ।
बड़े पापा ओर बड़ी मां के प्यार में मुझे कभी अपने शहर लोट जाने का मन ही नहीं हुआ । ऐसा नहीं है कि में कभी अपने शहर जाना नहीं चाहती। अपने मां पापा की याद नहीं आती ।
कभी कभी कुछ दिनों के लिए होकर आ जाती हूं, जब छोटी थी तो बड़े पापा ही मुझे अपने साथ ले जाते थे ओर जब भी मेरे शहर का रेलवे स्टेशन आता बड़े पापा वहां की भुजिया खिलाते । मुझे बड़ी पसंद थी , ओर उस शहर की फेमस भी जब कभी भी आना होता , बिना भुजिया खाए घर नहीं जाती । स्टेशन से घर तक के तांगे का सफर बड़ा याद आता है आज भी ….।
अचानक से दूध वाले की आवाज से मेरा ख्याल टूटा . मैने वही से आवाज दी आती हूं। इतने में देखा तो बड़ी मां दूध लेने जा चुकी थी , उन्होंने मुझे देखा ओर कहा पूर्वी आज तू कॉलेज नहीं गई । तबियत तो ठीक है ना , मैने कहा हां मां में बिल्कुल ठीक हूं ये कहकर
में किचन कि ओर चली गई और कॉफी बना कर ले आई। जब कभी भी में किसी सोच में होती हूं अक्सर ऐसे ही कॉफी लेकर बालकनी में बैठ आने जाने वालों को देखती रहती हूं,ओर आज भी इस अजीब से खयाल के दस्तक पर में फिर से बालकनी में आकर बैठ कर आने जाने वालों को देखती रही ।
कुछ देर ऐसे ही टकटकी लगाकर देखकर सोचा इस बार कितना टाइम हो गया अपने शहर गए ।
कुछ याद नहीं रहा , शायद एक साल , या 2 साल हो गए होंगे । में अंदर गई ओर टेबल पर रखे अपने पर्स में से एक टिकिट निकाला , मेरी आदत थी में जब भी अपने शहर जाती आखरी टिकिट अपने पास रखती ओर देखती कितना टाइम हो गया मुझे अपने मां पापा मिले ओर अपने शहर गए ।
मैने टिकिट निकला ओर तारीख देखी ।
लिखा था 10 दिसंबर 2017
पूरे 2 साल 4 महीने , क्या इतना बदल गई हूं में , जो अपने ही शहर से दूरी बना ली , ये सोचते सोचते में फिर बालकनी में आकर बैठ गई ,
कॉफी की चुस्की लेकर सोचती रही केसे होंगे मां पापा , पापा की तबीयत तो ठीक होंगी ना , फोन पर तो अक्सर बात हो जाती है पर क्या फोन पर पूछे गए ओपचारिक हाल चाल वास्तविक हाल चाल से मिलते होंगे ।
कितना आसान होता है ना फोन पर अपनी तबियत के बारे में बताना । ओर ,सब ठीक है इतना कह देना , यही तो करते है हम सब , ओर पापा की तो कब से आदत भी यही है किसी से कभी कुछ नहीं कहते सब मन में ही दबा के रखते है , अपनी तबियत कभी किसी को सही नहीं बताते , कितना कहते थे फोन पर कब आ रही है पूर्वी तू । इस दीवाली आयेगी ना , तेरी मां ने तेरे लिए तेरी पंसद की भुजिया भी बनाई है , कितना टाइम हो गया तुझे देखे ।
अब तो कुछ महीनों से तो वो भी कहना छोड़ दिया कि कब आएगी , आखिर मैने उनकी कभी सुनी ही कहा , खुद के लिए कितने ज़िद्दी होते है ना हम ,हमेशा मन की करते है कभी अपनों के मन की क्यू नहीं सोचते , अपने लिए अपनो के मन में क्या है , वो क्या चाहते है।
बचपन में बड़े पापा के पास रहने की ज़िद फिर , कभी ये करना है कभी वहां जाना है। फिर दूर बड़े शहर से M B A करने की ज़िद , ऐसा नहीं था कि बड़े पापा के शहर में कॉलेज नहीं थे , फिर भी उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा , बस ज़िद पूरी करते गए । ना पापा कुछ कहते, ना बड़े पापा , ओर पता नहीं शुरू से इतनी जिदी ओर मन मोजी क्यू थी ।
कभी खुद को समझ ही नहीं पाई ।
ओर आज ये ख्याल और यादे मुझे अन्दर तक खदेड़ रही है ।
आज MBA कर लौट आने के बाद एक अच्छी नोकरी भी मिल गई । ओर क्या चाहिए मुझे ।
आज जब नोकरी है पैसा है फिर क्यू में इतनी बदल गई के अपने घर को ही भूल गई ।
हम अपनो को पीछे छोड़ कर किसके लिए इतने आगे निकल जाते है , क्या इस भाग दौड़ वाली ज़िन्दगी में व्यस्त रहना इतना जरूरी है ।
अब क्या करूं में, मै अपने मन से खुद ही पूछने लगी ….। कुछ देर ऐसे थी सोचते हुए ।
मैने कॉफी का मग रखते हुए , हाथ में फोन उठाया ओर पापा को फोन लगाया ,
उधर से आवाज आई हैलो , में बोली पापा , वो बोले बेटा पूर्वी कैसी है तू , में चुप सी रह गई, पापा बोलते रहे , कुछ देर बाद बोली हैप्पी बर्थडे पापा , में आ रही हूं ।

— बस इतनी सी थी ये कहानी —
❤️

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लेखक हूं या नहीं, नहीं जानता , हा पर चले आते है कुछ शब्द लबो...
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